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Aug 1, 2012

मुझे तुम्हारी आदत ..

काश ! मुझे तुम्हारी आदत ही हो जाती,
तब भूल जाती तुम्हे किसी बुरी आदत की तरहा !

तुम तो मुझमे सुबह की भांति समाये हो मेरी एक उम्मीद बनकर ,
तुम तो मुझमे रात की भांति समाये हो मेरी एक हार बनकर ,
बदन के हर हिस्से में दर्द बनकर सहलाते हो तुम मुझे ...
लोग कहते हैं -
काश ! मुझे तुम्हारी आदत ही हो जाती !

भावनाएं इस तरहा तरसती हैं मुझे तेरा नाम लेकर ,
जैसे रौशनी से गुजर कर अँधेरे में गुम होती परछाई हूँ कोई,
जैसे वक़्त से गुजरा , पीला सा पत्ता हूँ कोई,
मुझसे झोंके बन टकराते हो , तब
तड़प कहती है -
काश ! मुझे तुम्हारी आदत ही हो जाती !

लगता है मौन में मुझको,
किसी ने छीन लिए हो , रंगीन सब सपने,
नाराजगी के सब कारण .
और छोड़ जाते हो टूटे बिखरे शब्द मेरे
और एक भीगता कागज ,
जो रुदन में कहता है -

काश ! मुझे तुम्हारी आदत ही हो जाती,
तब भूल जाती तुम्हे किसी बुरी आदत की तरहा !


-अंजलि माहिल 



2 comments:

  1. आदतें...जाती हैं क्या कभी?लाख कोशिशों के बाद भी पूरी तरह ,सारी उम्र पीछा कहाँ छोडती हैं...
    आदतें ...कभी नहीं छूटती ...और बुरी आदतें तो कभी भी नहीं

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