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Apr 13, 2011

वेदना

उसकी चोट मेरी ही 
खता सी लगती है मुझे |
वो दर्द अपने जब सुनाता है 
थामकर हाथ मेरा |
झुक जाती है नज़र मेरी ,
कांप जाता है बदन मेरा |
दिल तो करता है बढ़ कर ,
थम लूँ उसको ,
मगर मजबूर हूँ |
अपने जमीर पर कुछ बोझ लिए बेठी हूँ|
उसे तुमको दिखाऊँ कैसे ?
बताउं कैसे ?

मेरे ही लफ्ज मेरा साथ ,
छोड़ गये मेरा हमसाया बनकर ,
उसे तुमको दिखाऊँ कैसे ?
बताउं कैसे ?

टूटकर बिखर जाती है हस्ती मेरी ,
जब आसूं उसकी आँख का देखती हूँ ,
ये बात जाताऊँ कैसे?
बताउं कैसे ?

यूँ तो  सामना दुनिया का ,
करूँ , होंसला है मुझमे ,
जाने क्यूँ एक उसका ही सामना नही होता |
उसकी आँखों में  मैं अपना इंतजार देखती हूँ,
बात उसको बताउं कैसे ?
मज़बूरी अपनी सुनाऊँ कैसे ?
खुद को जलने से रोक पाऊं कैसे ?

उसकी हर चोट मेरी ही ,
खता सी लगती है मुझे |


BY: Anjali Maahil

11 comments:

  1. बहुत अच्छे से आपने भावनाओं को उभारा है.

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  2. बहुत सुन्दर अभिब्यक्ति | धन्यवाद|

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  3. बहुत सुन्दर लिखा है।

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  4. Thank u Yashwnt ji &
    AAP KA BHI SHUKRIYA PATALI -THE-VILLAGE.

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  5. सुंदर शब्द रचना ...आपका आभार

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  6. wow sach me ab kya kahu is poem ke bare me

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  7. अच्‍छे शब्‍दों के साथ भावनाओं का सुंदर तरीके से प्रस्‍तुतिकरण।
    शुभकामनाएं आपको।

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  8. वाह !! एक अलग अंदाज़ कि रचना ......बहुत खूब

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  9. वाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.
    आप बहुत अच्छा लिखती हैं और गहरा भी.
    बधाई.

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  10. बहुत ही खूबसूरती से आपने भावो को शब्दों में उतारा है..

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