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Dec 28, 2011

"हम बिन पंखों के पंछी "


"हम बिन पंखों के पंछी "
उड़ते खुले आकाश में
कोई दिशा नही कोई गति नही
हम बिन पंखों के पंछी !

ना वक़्त की आंधी उड़ा सकी,
ना वक़्त की बरखा भीगा सकी ,
जो एक डाल पर बैठ गये
हम बिन पंखों के पंछी .....

ना देखि कोई डगर नई,
ना देखा कोई शहर नया ,
सूखी-हरी लताओं ( परम्पराओं ) में उलझ गये
हम बिन पंखों के पंछी .....

छोटे मोटे कीट पतंगो (बुराइयों ) के संग ,
 हमने अपने अहम को पाला ,
भूल गये अब उठना उड़ना ,
हम बिन पंखों के पंछी .....

अपनी झूठी  शान के महलों में ,
हम घुट-घुटकर रह जाते हैं ,
भूल गये "पहचान" को अपनी
हम बिन पंखों के पंछी .....

-ANJALI MAAHIL 

15 comments:

  1. बिन पंखों के पक्षी ... पर उड़ना बहुत ऊँचा चाहते हैं ... सुन्दर प्रस्तुति

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  2. बेहद गहन और संवेदनशील अभिव्यक्ति।

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  3. बिन पंखों की यादें होती हैं जो उडती हैं आसमां में इधर उधर ...
    मार्मिक रचना है ...

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  4. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 29 -12 - 2011 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज... जल कर ढहना कहाँ रुका है ?

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  5. मैंने इस पर सबसे पहले टिप्पणी की थी ... नहीं दिख रही .. कमेंट्स के स्पैम में देखिएगा

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  6. सुंदर प्रस्‍तुति।
    गहरी अभिव्‍यक्ति।

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  7. gahan bhavo se likhi sundar abhivykti....

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  8. गहरी अभिव्यक्ति ...

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  9. बहुत बढ़िया खूबसूरत रचना

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  10. अपनी झूठी शान के महलों में ,
    हम घुट-घुटकर रह जाते हैं ,
    भूल गये "पहचान" को अपनी
    हम बिन पंखों के पंछी .....
    ... सुंदर

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  11. सुन्दर प्रस्तुति......

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